भारत को अब भी पत्रकारिता के लिहाज से सुरक्षित देश नहीं माना गया है।

भारत को अब भी पत्रकारिता के लिहाज से सुरक्षित देश नहीं माना गया है।

जानिए, कैसे पत्रकारों के लिए खतरनाक देश है भारत

अंतरराष्ट्रीय पत्रकारिता गैर लाभ संगठन की ओर से प्रकाशित विश्व प्रेस फ्रीडम इंडेक्स 2021 में भारत की रैंकिंग नीचे नहीं गिरी है

भारत   पत्रकारिता के लिहाज से दुनिया के सुरक्षित देशों में शुमार नहीं है। अंतरराष्ट्रीय पत्रकारिता गैर लाभ संगठन की ओर से प्रकाशित विश्व प्रेस फ्रीडम इंडेक्स 2021 में भारत की रैंकिंग नीचे नहीं गिरी है, लेकिन भारत को अब भी पत्रकारिता के लिहाज से सुरक्षित देश नहीं माना गया है। इसमें कहा गया है कि भारत विश्व के सबसे अधिक खतरनाक देशों में है, जहां पत्रकारों को अपना काम सुविधाजनक तरीके से करने में काफी परेशानियों का सामना करना पड़ता है।

 मंगलवार को जारी रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत, ब्राजील, मैक्सिको और रूस के साथ 'खराब' श्रेणी में है। गैर लाभकारी संगठन रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स (आरएसएफ) की ओर से जारी विश्व प्रेस फ्रीडम इंडेक्स 2021 में भारत की रैंकिंग पिछले वर्ष की तरह 142 ही है। मंगलवार को जारी रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत, ब्राजील, मैक्सिको और रूस के साथ 'खराब' श्रेणी में है। 2004 में यूपीए सरकार ने सत्ता संभाली तो भारत की रैंकिंग 120 थी, जो 2005 में 106 तक आ गई थी। वहीं, 2014 में यूपीए की सत्ता जाने तक रैंकिंग गिरकर 140 तक पहुंच गई थी। हालांकि, यूपीए शासनकाल के दौरान 2006 व 2009 में 105 तक भी आ गई थी।

नवीनतम रिपोर्ट में भारत के किसी भी आलोचना करने वाले पत्रकार के लिए भाजपा समर्थकों द्वारा बनाए गए डराने-धमकाने के माहौल को जिम्मेदार ठहराया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, ऐसे रिपोर्टर को ‘राज्य-विरोधी’ या ‘राष्ट्र-विरोधी’ के रूप में चिह्नित किया जाता है। इसमें कहा गया है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ‘मीडिया पर अपनी पकड़ मजबूत कर ली है।’ 

रिपोर्ट में कहा गया है कि, ‘2020 में अपने काम के दौरान चार पत्रकार मारे गए। ऐसे में भारत पत्रकारों के लिए दुनिया के सबसे खतरनाक देशों में से बन गया है, जहां अपना काम ठीक से कर पाना बहुत कठिन है।’ पत्रकारों को हर तरह के हमले का सामना करना पड़ता है, जिसमें पुलिस हिंसा, राजनीतिक कार्यकर्ताओं द्वारा घात लगाना, और आपराधिक समूहों या भ्रष्ट स्थानीय अधिकारियों द्वारा उकसाए गए विद्रोह शामिल हैं। 2019 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भारतीय जनता पार्टी की भारी जीत के बाद मीडिया पर हिंदू राष्ट्रवादी सरकारों की लाइन पर चलने के लिए दबाव बढ़ गया है।’

रिपोर्ट कहती है, ‘हिंदुत्व की विचारधारा का समर्थन करने वाले भारतीय सार्वजनिक बहस को राष्ट्रविरोधी विचार साबित करने पर जुटे हैं। भारत में हिंदुत्व का समर्थन करने वालों के खिलाफ लिखने वाले या बोलने वाले पत्रकारों को निशाना बनाया जाता है, उनके खिलाफ सोशल मीडिया पर नफरत भरा अभियान चलाया जाता है। पत्रकारों के खिलाफ हिंसक घटनाओं को अंजाम दिया जाता है, विशेष रूप से जब निशाना महिला हो।’

रिपोर्ट कहती है कि सरकार की आलोचना करने वाले पत्रकारों को चुप कराने के लिए उन पर राजद्रोह जैसे मुकदमे चलाए जाते हैं।

रिपोर्ट में कहा गया, ‘भारत सरकार ने किस प्रकार देश में कोरोना महामारी का लाभ उठाकर प्रेस की स्वतंत्रता को कुचलने का काम किया। कश्मीर में स्थिति अभी भी चिंताजनक है। वहां पर पत्रकारों को अभी भी पुलिस और अर्द्धसैनिक बलों द्वारा प्रताड़ित किया जा रहा है। वहां ऑरवेलियन कंटेट रेगुलेशन का सामना किया जा रहा है, जो मीडिया आउटलेट के बंद होने के लिए जिम्मेदार है, जैसा कि कश्मीर टाइम्स के साथ हुआ।’

रिपोर्ट कहती है, ‘सरकार समर्थित मीडिया ने दुष्प्रचार शुरू किया है। ऐसे पत्रकार जो सरकार की आलोचना करने की हिम्मत रखते हैं, उन्हें भाजपा के समर्थकों द्वारा राष्ट्रविरोधी या यहां तक कि आतंकवादी समर्थक तक कहा जा रहा है।’

जारी की गई विश्व प्रेस फ्रीडम इंडेक्स 2021 में 180 देशों में सबसे ऊपर नॉर्वे है। इसके बाद फिनलैंड और डेनमार्क हैं। जबकि सबसे नीचे इरिट्रिया है। चीन 177 वें स्थान पर है, और उत्तरी कोरिया के ऊपर 179 और तुर्कमेनिस्तान में 178 वें स्थान पर है। भारत पिछले साल की तरह ही 142 वें स्थान पर है। 2016 में 133 के बाद से यह लगातार नीचे खिसक रहा है। दक्षिण एशियाई देशों में पड़ोसी नेपाल 106, श्रीलंका 127, म्यांमार (तख्तापलट से पहले) 140, पाकिस्तान 145 और बांग्लादेश 152वें स्थान पर हैं।

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